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चले आओ , न अब जाओ - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’65
चले आओ , न अब जाओ
मुहब्बत है तो मुस्काओ
मेरे सँग़ तुम हँसो गाओ
सलीक़े से मुसे पाओ
उसे पा कर न इतराओ
सियासत से तो बाज़ आओ
लुभाने में मगन सब हैं
न लालच में कभी आओ
कई जयचंद हैं जिंदा
वतन वालो सँभल जाओ
नहीं आसां ग़ज़ल कहना
ग़ज़ल क्या है न समझाओ
इलेक्शन का 'कँवल'मौसम
चला आया है घर आओ
सृजन : 12 अक्टूबर,2025
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन
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