#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’11
आप ख़्वाबों में जगमगाने लगे
हौसला इश्क़ का बढ़ाने लगे
लफ़्ज़ होंठों से जब हुए ग़ायब
मेरी आंखों में मुस्कुराने लगे
जबसे बदली है रूठकर डीपी
बेतरह और मुझको भाने लगे
रफ़्ता रफ़्ता हमें भुला देना
मेरे पहलू में आ बताने लगे
यकबयक हमको भूल बैठे वो
भूलने में जिन्हें ज़माने लगे
नेक नीयत ख़ुलूस रस्मे-वफ़ा
दौरे-हाज़िर में दूर जाने लगे
रुख़ पे डाले हैं ऐप ऐसे जो
रूप असली 'कँवल' छुपाने लगे
सृजन : 23 फ़रवरी, 2025 (रविवार)
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन